भाजपा के पीलीभीत से उम्मीदवार, इमरजेंसी में चर्चित संजय गांधी और प्रख्यात पर्यावरणविद मेनका गांधी के बेटे और देश की लौह महिला पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पोते वरुण गांधी अपने कथित जहरीले भाषण के लिए पूरे देश में आलोचना का पात्र बने हुए हैं। परोल पर छूटे वरुण, तो कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की तत्काल टिप्पणी आयी- वरुण की हवा निकल गयी। वरुण का मामला अदालत में है। वरुण दोषी हैं या निर्दोष यह फैसला अदालत करेगी। उसका फैसला सिर-आंखों पर।
पर वरुण को लेकर जिस किस्म की राजनीति हुई है, उससे एक अलग तरीके का जहर बहुसंख्यकों के मन में घुल रहा है। वरुण ने जो कहा, उसमें अगर सचमुच किसी कौम विशेष को लेकर जहरीली टिप्पणी है, तो वरुण ने वाकई गलत किया। वह अभी बच्चे हैं। उनकी उम्र अभी कम है। वह राजनीति के पेंच कम समझते हैं। वह उन लोगों जितने परिपक्व और कुशल संगठनकर्ता नहीं हैं, जिन्होंने देश के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अपने निजी कानून का हवाला देकर बदलवा लिया था। वरुण बाल ठाकरे की तरह पालिश्ड भी नहीं हैं, क्योंकि ठाकरे कहते हमेशा अपने मन की हैं, पर लेखन की स्वतंत्रता की आड़ में। ठाकरे का होल्ड है, वह मराठियों के भाग्य विधाता बनने की योग्यता पा चुके हैं।
वरुण के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उन्हें देश को चोट पहुंचानेवाली राजनीति सहन नहीं होती। यह उन्हें कांग्रेस से सीखना चाहिए, जो आजादी के बाद अधिकांश समय तक सत्ता में बने रहते कश्मीर का सारा खेल बिगाड़ कर रख दिया, वह भी सलीके से। कश्मीर में आज स्थिति यह है कि भारत के लिए हो रहे आम चुनाव में दम भर पाकिस्तान की वकालत करनेवाला अलगाववादी सज्जाद लोन चुनाव में खड़ा है। संभव है वह जीत भी जाये और संसद में अलग कश्मीर की मांग बुलंद करे। वरुण को वामपंथियों से भी सीख लेनी चाहिए कि किस तरह दो दशक तक बंगाल में राज करते हुए उन्होंने बांग्लादेशियों को पश्चिम बंगाल में रहने, जीने-खाने और वोट देने का अधिकार सुनिश्चित किया। आज पूरे बंगाल में यही बांग्लादेशी प्रत्याशियों की किस्मत तय करते हैं। आतंकवादियों को अपने घर में पनाह देते हैं। देश की सुरक्षा में छेद करते हैं। जासूसों को देश के खिलाफ काम करने का मौका मुहैया कराते हैं।
वरुण को शायद नहीं पता कि इस देश में बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था, मानबिंदुओं, संस्कृति और परंपरा की बात करना पाप है। ऐसा कहनेवाला सांप्रदायिक है। वह भावावेश में बोल तो गये, पर बेचारी मेनका का दिन का चैन, रात की नींद हराम कर दी। वरुण को कुछ बोलना है, कुछ करना है हिंदुओं के लिए, तो इसकी टैक्टिक्स उन्हें अभी और सीखनी होगी। हिंदुओं को गाली देने, उनकी परंपरा की खिल्ली उड़ाने और सभ्यता के नाम पर ढेरों पंथ की जी-हुजूरी में लगे यहां के समाज में वरुण को वह चालाकी सीखनी ही होगी, जिसके बूते इस देश को कौम के नाम पर प्रयोगशाला बना दिया गया है। वरुण की विचारधारा उन्हें सचमुच हीरो के काबिल बनाती है, पर उनके एक्ट करने का तरीका गलत है। उम्मीद है, उम्र बढ़ने के साथ वह इसे सीख जायेंगे।
Friday, April 17, 2009
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2 comments:
अरे घन्नू जी आपने कहा तो ठीक ही है.....इस बात पर हम आपसे सहमत भी हैं......!!
kahan soye hain do mahine se.
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