अविनाश आज एनडीटीवी में ऊंचे ओहदे पर है, पर १९९४-९५ के दिन याद करता हूं तॊ सहसा विश्वास नहीं हॊता कि जॊ लड़का कभी हाफ पैंट पहनकर प्रभात खबर के दफ्तर में अपनी चंद कविताएं लेकर आया था, उसने देखते ही देखते कैसे खुद कॊ पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में साबित कर दिया । यह जाड़े का वक्त था । हम प्रभात खबर में थे । नये जमाने का फीचर निकालने की विधा में पिछले पांच-सात सालॊं में अच्छा अनुभव हॊ चला था । आत्मविश्वास इसलिए भी प्रबल हॊ रहा था, क्यॊंकि फीचर का स्वतंत्र प्रभार हरिवंश जी ने मुझे दे दिया था । श्रीनिवास जी अब संपादकीय पेज के प्रभारी हॊ गये थे । मैं फीचर में रम सा गया था । जैसी जिम्मेदारी,वैसा परफारमेंस- यही मूलमंत्र बना रहा जीवन का- आजतक । खैर, उस दिन ऐसे ही शाम के झुटपुटे में जग से पानी पी रहा था । अचानक देखा दॊ लड़के टेबल के सामने खड़े हैं । हाथॊं में कागज का पुरजा सा था । एक लड़का गॊरा और लंबा सा था, जबकि दूसरा सामान्य कद का और सांवला सा था । मैंने उन्हें बिठाया और नाम पूछा । इसपर सांवले लड़के ने दूसरे कॊ मौका दिये बिना कहा- मैं हूं अविनाश और ये है विनय भरत । कुछ कविताएं लिखी हैं, देखिए, छप सकती हैं क्या ? मैंने कविताएं पढ़ीं, अविनाश वाली । एकबारगी लगा, अरे इस लड़के में दम है । इतना तॊ याद नहीं अब,पर वह कॊई छंदमुक्त कविता थी, जिसमें सहज प्रवाह, अभिव्यक्ति और लक्षणा-व्यंजना के अलावा एक उतरता सा कॊमल सुर भी था । मैंने मन में सॊचा, इस लड़के से और भी कुछ लिखवाना चाहिए । सिफॆ कविता के फेर में पड़ा रहेगा, तॊ शायद इसके अंदर की अभिव्यक्ति मुखर हॊने के पहले ही डूब जाए । मैंने कहा- यह कविता छाप दूंगा, पर तुम कुछ और क्यॊं नहीं लिखते । फिर अविनाश और विनय भरत दॊनॊं कॊ आनेवाले दिनॊं में दजॆनॊं टापिक दिये और कई कवर स्टॊरीज छापीं । अविनाश में गजब की जिजीविषा थी । वह शुरू से ही अति महत्वाकांक्षी रहा है । उस वक्त भी वह हमारा दिया एसाईनमेंट तॊ करता था, पर उसके हावभाव जताते थे कि वह सिफॆ ऐसे ही आलेख लिखने के लिए नहीं बना है । वह और ऊंचा जाना चाहता है और कैरियर की शुरूआत से ही आगे कौन सी दिशा पकड़नी है, यह तय कर चुका था । इसी बीच १९९६ में प्रभात खबर पटना में लांच हुआ और हम कुछ लॊग फाउंडर एडीटॊरियल टीम के बतौर वहां गये । प्रभात खबर अप्रैल में खुला था और उसके तीन महीने बाद ही मानसून ने कहर ढाना शुरू कर दिया । बरसात में समूचा उत्तर बिहार अपने तमाम दुख-ददॆ और विरासत समेत शेष भारत से कट जाता है । बाढ़ की विभीषिका कॊ साल-दर-साल झेलने कॊ अभिशप्त लॊग अपनी फूटी किस्मत के साथ कैसे अक्तूबर तक का वक्त काटते हैं, यह सब दुनिया कॊ बिलकुल पीर-पराई लहजे में अखबार के माध्यम से बताने का ख्याल हरिवंश जी कॊ आया और बाढ़ की विभीषिका कॊ शब्द देने के लिए उस वक्त सबसे अच्छा कलमकार अविनाश प्रभात खबर में मौजूद था । अविनाश ने कमान थामी । हम पटना में यॊजना बनाते, अविनाश एक कुरता-पायजामा पहने, बगल में झॊला लटकाए, अपने अलमस्त अंदाज में पूरे उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाकॊं की खाक छानने लगा । वह सप्ताह भर गायब रहता, फिर अचानक किसी दिन आफिस में दिखाई पड़ता । पता चलता, झंझारपुर से आ रहा था । उसके यात्रा वृत्तांत लॊग बड़ी रुचि से पढ़ते थे । मंझिआंव, झंझारपुर, मॊतिहारी, दरभंगा, समस्तीपुर और जाने कहां-कहां से लौटकर अविनाश । लॊग बाढ़ की विभीषिका और अविनाश की जुबानी बाढ़ की कहानी पढ़ते तॊ उसके जीवंत चित्रण से सारी पीड़ा पाठकॊं की आंखॊं के आगे मुखर हॊ जाती । धीरे-धीरे हम सभी और अविनाश कॊ जाननेवाले भी अविनाश कॊ लौटकर अविनाश पुकारने लगे । उसके बाद अविनाश ने अपनी प्रतिभा से कितना फासला तय किया,यह बताने की जरूरत नहीं । जहां तक विनय भरत की बात है, वह लड़का आजतक संपकॆ में है । उसने अंगरेजी भाषा से स्नातकॊतर किया । बीच में प्रभात खबर और हिन्दुस्तान के लिए छिटपुट आलेख लिखता रहा । इस बीच उसकी पेशकार के रूप में झारखंड सरकार में नौकरी भी हॊ गयी थी, पर उसने नौकरी छॊड़ दी । एक दिन वजह पूछी तॊ कहने लगा, भैया क्या करें, सैटिस्फैक्शन नहीं था । आप कुछ भरॊसा दें, तॊ पत्रकारिता ही करूंगा । यहीं मुझे सूट करती है । फिलहाल वह यॊगदा कालेज, रांची में छात्रॊं कॊ अंगरेजी साहित्य पढ़ा रहा है । पर अभी भी उसे पत्रकारिता में अच्छा आफर मिले, तॊ मेरा विश्वास है, वह व्याख्याता की नौकरी छॊड़ देगा ।
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Tuesday, January 29, 2008
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24 comments:
आपका संस्मरण बहुत अच्छा लगा
अविनाश जी के बारें में यह शानदार जानकारी के लिए आप वाकई साधुवाद के पात्र हैं
दिलचस्प कहानी है अविनाश की. बाढ़ की वो जीवंत कहानियाँ यदि कहीं नेट पर उपलब्ध हो या हो सके तो कृपया बताएँ...
घनश्याम जी, लगभग 15 साल पहले के पुराने अविनाश से परिचय कराने के लिए धन्यवाद। आपके पास अनुभवों का जबर्दस्त पिटारा है। नौकरियां तो हममें से ज्यादातर लोगों ने की हैं। लेकिन यादों का ऐसा भंडार कम लोगों के पास है। किताब का इंतजार रहेगा।
बहुत अच्छा लगा ..आविनाश को आपकी कलम से जानना.
इन पुराने अविनाश से मिलना भी बहुत अच्छा लगा । मिलाने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
आपके मार्फ़त अविनाश जी के बारे मे जानकार अच्छा लगा।
साधूवाद
अविनाश से संबंधित पॊस्ट पर कमेंट करनेवाले सभी मित्रॊं कॊ हृदय से आभार । पहली बार ब्लाग की ताकत देख रहा हूं । आप सभी से इतनी सहजता से जुड़ना हॊ जाता है, तमाम व्यस्तताओं के बाद, यह कम है क्या ? अपने अनुभवॊं कॊ समेटने का निणॆय तॊ यह ब्लाग बनाने के बाद ही लिया, क्यॊंकि तबतक पत्रकारिता की दुनिया में बहुत सारा पानी बह गया था, अगर हमारे जमाने की पत्रकारिता से बात शुरू करूं तब । तॊ यह लगा कि हरिवंश जी, हरिनारायण जी, रजत दा, अविनाश, शिबू दा, प्रकाश जी, बापी जैसे तमाम लॊगॊं से जुड़े संस्मरणॊं के माध्यम से यह बताया जाए कि एक धारा पत्रकारिता की ऐसी भी बह चुकी है, जिसे जानकर शायद इस विकसित पत्रकारिता की धारा के हम पत्रकार बंधुओं कॊ बहुत मजा आएगा । इसलिए अपने ब्लाग कॊ संस्मरण की शक्ल दे दी । अविनाश के बारे में एक बात और बता दूं कि पिछले पांच महीने से नौएडा-गाजियाबाद में हूं, अविनाश मेरे बगल में ही है, लगातार फॊन पर बातें हॊ रही हैं, पर अभी तक हमारा मिलना नहीं हॊ पाया है । कुछ ऐसे- तुम्हें कब फुरसत गैरॊं से, हम अपने गम से कब खाली, लॊ हॊ चुका मिलना अपना, ना तुम खाली-ना हम खाली ।
घनश्याम
अविनाश से संबंधित पॊस्ट पर कमेंट करनेवाले सभी मित्रॊं कॊ हृदय से आभार । पहली बार ब्लाग की ताकत देख रहा हूं । आप सभी से इतनी सहजता से जुड़ना हॊ जाता है, तमाम व्यस्तताओं के बाद, यह कम है क्या ? अपने अनुभवॊं कॊ समेटने का निणॆय तॊ यह ब्लाग बनाने के बाद ही लिया, क्यॊंकि तबतक पत्रकारिता की दुनिया में बहुत सारा पानी बह गया था, अगर हमारे जमाने की पत्रकारिता से बात शुरू करूं तब । तॊ यह लगा कि हरिवंश जी, हरिनारायण जी, रजत दा, अविनाश, शिबू दा, प्रकाश जी, बापी जैसे तमाम लॊगॊं से जुड़े संस्मरणॊं के माध्यम से यह बताया जाए कि एक धारा पत्रकारिता की ऐसी भी बह चुकी है, जिसे जानकर शायद इस विकसित पत्रकारिता की धारा के हम पत्रकार बंधुओं कॊ बहुत मजा आएगा । इसलिए अपने ब्लाग कॊ संस्मरण की शक्ल दे दी । अविनाश के बारे में एक बात और बता दूं कि पिछले पांच महीने से नौएडा-गाजियाबाद में हूं, अविनाश मेरे बगल में ही है, लगातार फॊन पर बातें हॊ रही हैं, पर अभी तक हमारा मिलना नहीं हॊ पाया है । कुछ ऐसे- तुम्हें कब फुरसत गैरॊं से, हम अपने गम से कब खाली, लॊ हॊ चुका मिलना अपना, ना तुम खाली-ना हम खाली ।
घनश्याम
अविनाश के गढ़े जाने की यह कथा रोचक है। उनके स्वभाव, चरित्र और मिजाज का बारीक विश्लेषण भी इसमें है।
Avinash ke baare mein kuch dino pahle hi ghannu bhaiya se churcha ho rahi thi ki wah kis tarah half pant pehankar kavita chapwane saikal pe chadhkar aata tha.Us samay use apne aap ko isthapit karna tha. Bahut dino ke baad main jab patna mein usse mila to uske milne ke andaz se pata chala ki woh wakai pehle wala halfpantiya avinash nahin raha, ab ka to nahin pata par us samay laga ki kuch ghamand sa usme aa gaya hai, khair vinay se kuch 7-8 saal pahle dilli mein mulakaat hui thi, aur hamne univercity colony wale dino ki yaad taza ki thi.Haan vinay yadi tum ise padhoge to plz mere room partner ki woh kitab wapas kar dena jo tumhare dhyan se shayad utar gayi hai.Avinash aur Vinay kabhi milo aur hum baithkar phir purani baaten yaad karen.
चलिये आपके बहाने अविनाश जी के बारे कुछ तो पता चला...... तो ऐसे थे अविनाश...जो आज भी सन्तुष्ट तो नही हैं,शुक्रिया
जानकारी के लिए धन्यवाद
आपकी उन पुरानी यादों और अनुभवों से निश्चित रूप मुझ जैसे नए नवले पत्रकार कुछ सीखेंगे,
इसी उम्मीद में
bahut badhiya. avinash ke bare men sateek chitran ghanshyam bhaiya hi behtar kar sakte hain kyunki vey saakshi rahe hain uske bade patrakaar banne men, nirmaan men. maza aa gaya. purane dinon ki yaaden jeewant ho utheen.
एक अविनाश
के बारे में
दूसरे अविनाश
को पता चला है
एक फूल
हाफ पैंट
पहनकर खिला है
जो कांटों में
रहा है
अब भी कांटों
में बसा है
वो सूरजमुखी है
देदीप्यमान है
संघर्षशील है
और
बहुत शील है.
मनोज भाई (manojtoons), आप एकदम ग़लत बात कह रहे हैं। आपसे कभी वैसा पेश नहीं आया - आपको लगा - इसके लिए अब माफी मांग रहा हूं। हमलोगों को जब पूरा वाक्य लिखना भी नहीं आया था, तब से आप प्रभात ख़बर के नियमित कार्टूनिस्ट हैं। पटना में काम के बोझ तले दबे हुए इस नौजवान ने ज्यादा से ज्यादा वक्त नहीं दिया होगा। क्योंकि उन दिनों मिथिलेश जी का बड़ा टेंशन रहता था। पूरी मेहनत से बना-बनाया पेज फाड़ कर मुंह पर मार देते थे। ऐसे में बताइए, आपसे मैं सहज रूप से बात कर सकता था। विनय भरत से कभी-कभी बात होती है। ये जानकारी बाक़ी लोगों के लिए है - हम और विनय स्कूल में साथ-साथ पढ़ते थे। दोनों में गहरी दोस्ती थी, क्योंकि स्कूल की सांस्कृतिक गतिविधियों को हम दोनों ही लीड करते थे। वो शार्प था, पढ़ने में भी तेज़ था और परफेक्शनिस्ट भी ग़ज़ब का था। अक्षर उसके मोतियों जैसे सहज रूप से होते थे। मैं तो बना बना कर लिखता था। स्कूल के बाद हमारी मुलाक़ात कम हो गयी, लेकिन जब भी मिलते, प्रभात ख़बर का एक चक्कर लगा लेते थे। घनश्याम भैया का उस समय जलवा था। वे प्रभात ख़बर के राजेश खन्ना थे। दो मिनट हमलोगों को समय दे देते, तो हमलोग निढाल हो जाते थे। एक बार हम और विनय उन्हें अपनी अपनी कविता देकर लौट आये और भूल भी गये। क्योंकि हमारी दर्जनों कविताएं उनके पास पहले से थीं और एक के भी छपने की संभावना नहीं थी। ऐसे में इन कविताओं का भी यही हाल होना था। मैं दरभंगा अपने शहर आ इंटरमीडिएट कर रहा था। बहुत बाद में जब मैं रांची गया, तो धुर्वा में रहने वाली मेरी ममेरी बहन ने बिस्तर के गद्दे से निकाल कर प्रभात ख़बर के रविवार की एक कटिंग हाथ में पकड़ायी। मेरी और विनय भरत की कविता साथ-साथ छपी थी। मेरी कविता में घनश्याम भैया को दुरुस्त करने की ज़रूरत पड़ी थी, लेकिन विनय की कविता जस की तस थी। वो कमाल का प्रतिभाशाली शख्स है और मैं उसके आगे कुछ भी नहीं हूं। मुझे ये अच्छा लग रहा है कि घनश्याम भैया ने विनय को उसको मिलने वाले वाजिब सम्मान के साथ याद किया है - जबकि अभिव्यक्ति के चमकते हुए परिदृश्य में वो आज कहीं नहीं है।
और स्वयं प्रकाश, तुम हो कहां बेटा... दो दिन से तुम्हें फोन लगा रहा हूं... और तुम रिसीव भी नहीं कर रहे... न ही पलट के फोन कर रहे हो... एक तो बाबूजी के बारे में ख़ैरियत जाननी थी... और दूसरा, कुछ ज़रूरी बात भी करनी थी।
और घनश्याम भैया, ये 93-94 की बात नहीं है, 92-93 की बात है। हम चार साल के फ़ासले के बाद प्रभात ख़बर, पटना में दुबारा मिले थे।
हर किसी की यात्रा में ऐसे मकाम आते हैं --
अविनाधा जी के इन लम्हों से मिलवाने का शुक्रिया --
भई बढ़िया संस्मरण । दिलीप मंडल सही कहते हैं। और खोलिये पोटली।
Avinash, mujhe jaisa laga waisa maine saaf-saaf kah diya, ho sakta hai main hi galat hoon. maafi- waafi wali koi baat nahin.Jaankar khusi hui ki tum ndtv me accha kaam kar rahe ho, aur tumhara mohalla kaisa chal raha hai? Ghannu bhaiya ya anuraag se mera no le lena kyonki tumhara no mere paas nahin hai. Baki milne pe.
शब्दों में संवेदना क्योंकर उपजती है इसका प्रमाण है ये संस्मरण...96-97 के दिनों में मैं भी पहुँचा था प्रभात ख़बर के दफ़्तर अपने सीनियर प्रवीण भैया (प्रवीण मल्लिक)से मिलने, वहाँ उन्होंने अकिंचन जी से मिलवाया, संयोगवश हरिवंश जी भी थे वहाँ,उनको 15-20 फीट दूर से देखा,आख़िर संपादक थे, ऐसे थोड़े ही मुँह उठाकर जाया जा सकता है संपादक के सामने... लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही, ये हाफ़ पैंट का क्या चक्कर है?माँ सरस्वती छाप वैशाली रजिस्टर के पन्नों पर दो-चार लाइनें लिखकर, एक घंटा साइकिल चलाकर तो हम भी जाते थे नभाटा में गुंजन जी-नवेंदु जी-विद्या भैया से कुछ छपवाने की हसरत लिए, मगर दफ़्तर में याद नहीं पड़ता कि कोई हाफ़ पैंट वाला दिखा हो!अविनाश दा थोड़ा प्रकाश डालें क्योंकि पटना-अख़बारी दफ़्तर-हाफ़ पैंट, थोड़ा चित्र नहीं उभर पा रहा.
अविनाश जी, एक बात तो उभर के सामने आयी है कि आप पत्रकारिता के रियल हीरो हैं। अविनाश खुद में एक एसी छवि बन चुका है इस नाम के शीर्षक ने बहुतों को यह उत्सुकता दिलायी कि वो जाने कि आखिर अविनाश के बारे में बात क्या है।
पत्रकारिता से नहीं जुड़े होने के बावजूद भी आपकी छवि मेरे मन में भी आपके लिए आदर भाव जगाती है। आप से जब कभी भी मेरी बात हो पायी है मैने आपको कभी भी ऊँचे ओहदे पर शीर्षमान की तरह नहीं बल्कि एक आम आदमी की तरह पाया जो जिंदगी की छोटी-छोटी खुशियों को जीना जानता हो।
बाढ़ का वर्णन वाकई में मार्मिक है और रविरतलामी जी की तरह मेरी भी उत्सुकता है कि मैं अविनाश जी के उन रिपोर्टों को पढ़ पाउँ।
घनश्याम जी, औरों की पता नहीं पर आपके बारे में आज जानने का मौका मिला और वो भी अविनाश जी पर संस्मरण लिखने के कारण। इसे आप इस तरह भी ले सकतें हैं...आपका बनाया चरित्र कभी आपके अपने चरित्र को भी प्रकाश में लाने में मदद करता है।
बहुत बहुत धन्यवाद।
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