Thursday, October 8, 2009

बदल रहे हैं बच्चे

एक दिन एक परिचित के घर गया था। पांच साल का उनका हाइपर एक्टिव बच्चा एक प्ले स्कूल में पढ़ता है। ये लोग मुजफ्फरपुर के हैं। बच्चा तीन साल मुजफ्फरपुर में रहने के बाद रांची आया था। पूरे तीन घंटे उसे वाच करने पर लगा- वाकई बदल रहे हैं आज के बच्चे। वह शुद्ध हिन्दी बोलता है। उसकी बोली बदल चुकी है। घर के लोग यानी उसके दादा-दादी, बुआ अपनी बोली में बात करते हैं और उसके मां-पिता बिहारी हिन्दी में। पर बच्चे की बोली में शुद्ध हिन्दी का पुट है। वह कार्टून की भाषा बोलता है। जैसे हगेमारू, शिनचैन, बेन टेन में बोली जाती है, इन सीरियलों की का‍पी करता है वह। उसकी मां कह रही थी- हम हैरत में हैं। यहां शुद्ध हिन्दी कोई नहीं बोलता, जाने कैसे सीरियल देखते-देखते इसकी भाषा, बोली, व्यवहार, खाना-पीना सबकुछ बदल गया है। उससे बात करें और परिवार का बैकग्राउंड आपको पता न हो, तो आप अनुमान भी नहीं लगा सकते कि बच्चा बिहारी है। आपको लगेगा यह परिवार या तो दिल्ली का है या पश्चिमी उत्तर प्रदेश का। उसे सीरियलों की सारी सिक्वेंसेज याद हैं। समय याद है। सारे चरित्रों का टोन याद है। कौन कार्टून किस समय आता है, उसके पहले एपीसोड में क्या हुआ था-सबकुछ उसे याद है। कह सकते हैं- उसकी पीढ़ी बिलकुल बदल गई है। वह किसी से भी ऐसे ही बात करता है। उसमें कोई बनावटीपन नहीं है। सबकुछ सहजता से करता है वह।लगा, जब छोटे शहर के बच्चे में सीरियल इतना बदलाव ला सकते हैं, तो महानगरों के बच्चे कितने बदल रहे होंगे। एक ऐसा परिवर्तन, जो बच्चे के साथ रहनेवाले लोगों की सामान्य बोलचाल, व्यवहार और रिवाजों से भी हठात आगे जा रहा है। बच्चों का यह विकास कहां जाकर रुकेगा। सवाल यह भी है कि जब वे अपनी पीढ़ी के समझदार नागरिक बन जाएंगे, तो क्या परिवार के आचार-व्यवहार और परंपराओं पर वे बहस भी करेंगे या सबका मुंह ताकते हुए उनकी खिल्ली उड़ाएंगे। या फिर इन परंपराओं और पारिवारिकता को वे दकियानूसी करार देंगे। फिर भारतीय परिवारों में जिन संस्कारों की बात हम किया करते हैं, उन संस्कारों से उनका कितना नाता रह जाएगा। यह बदलाव उस युग में स्वीकार्य तो होगा, पर क्या यह सब पुरानी पीढ़ी के बीच भी बहस का मुद्दा बनेगा। सोचिए, कितनी तकलीफ होगी उन्हें, जो इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाएंगे।इस किस्म के बच्चे आनेवाली दुनिया के नये रूप का अक्स दिखा रहे हैं। यह परिवर्तन घर-घर में हो रहा है। बच्चों का आइ क्यू तेज हो रहा है। वे अपनी लीक बनाने की जिद में तेजी से परंपराएं तोड़ने में यकीन रखते हैं। इन बच्चों को देखते हुए आनेवाले समाज की कल्पना की जा सकती है।

Friday, September 11, 2009

मान गए राहुल भैया

विरासत की राजनीति से लैस राहुल गांधी ने अपने व्यक्तित्व में काफी कुछ जोड़ लिया है। वह समझ गए हैं कि बूढ़ों की समझौतावादी कवायदों से जनता का दिल नहीं जीता जा सकता है। इस गोरे-चिट्टे, खानदानी और मासूम से दिखनेवाले शख्स के लिए राजनीति अब परफेक्ट करियर बन गई है। उनकी टीम में युवाओं की फौज है, वे जमीन से जुड़े लोगों को तरजीह दे रहे हैं, हारे हुए इलाकों का डाटाबेस गंभीरता से तैयार किया जा रहा है। राहुल यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस कुछ करिश्माई फैसले ले सकती है, जो पूर्व के कई गैर-जिम्मेवार फैसलों से डिगा विश्वास वापस लौटाने का सबब बनेगा। उनकी एक युवा टीम फिलहाल झारखंड में है। यह टीम अद्भुत तरीके से काम कर रही है। सात-आठ युवाओं को राहुल ने यहां भेजा है। टीम दिनभर, देर रात तक काम करती है। गांव-गांव खंगाले जा रहे हैं। पोषित नेताओं की छुट्टी के संकेत हैं, जबकि दरकिनार प्रतिभाओं को सामने लाने, उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देने पर विचार हो रहा है। झारखंड जैसे छोटे प्रदेश को लेकर भी राहुल की चिंता से यह साफ है कि कांग्रेस को नया स्वरूप देने के मामले में वह गंभीर हैं। राहुल का करिश्मा हर आम व खास पर छाने लगा है। वह इसलिए क्योंकि वह लाइमलाइट से दूर रहकर जमीनी काम को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। उनके सौम्य, युवा चेहरे को देखते ही लोगों के मन में प्यार, सहानुभूति का भाव उमड़ता है, युवतियां आकर्षित हो जाती हैं, युवाओं के वह रोल माडल बन जाते हैं, बूढ़ी महिलाएं उन्हें अपने करीब पाकर धन्य हो जाती हैं। उनका कद व रुतबा इतना बड़ा है कि आम जनता उन्हें अपने पास, अपने गांव-मुहल्ले में देखते ही पागल हो जाते हैं कि अरे, इतना बड़ा आदमी, इतनी सहजता से लोगों से कैसे मिल रहा है। जरा भी गुरूर नहीं, इतना सुंदर, भोला और इतना जमीनी। यही काम राजनीति में अवसर पानेवाले न युवा कर पाए, न अन्य नेता। कुछ नेता अपवाद जरूर हैं। राहुल की कार्यशैली और उनका व्यक्तित्व राजनीति की एक अलहदा परिभाषा गढ़ने को आतुर है, इतना तो तय है।

Thursday, September 10, 2009

मौसम से बात करते हैं डा झा

मौसम की भविष्यवाणी के लिए राष्ट्रीय राजधानी और राज्यों में बाकायदा अलग विभाग हैं। आमलोग बहुत हद तक इनकी भविष्यवाणियों पर निर्भर करते हैं। किसानों को रोपनी, बुवाई, कटाई के लिए हिदायत, मार्गदर्शन चाहिए, तो आमलोग अपने सफर के लिहाज से, दैनंदिन कामकाज के लिहाज से इन भविष्यवाणियों को पूरी तवज्जो देते हैं। क्या पता, भारी बारिश की भविष्यवाणी में बगैर तैयारी के निकल जाएं, तो फिर लस्तम-पस्तम तय ही समझिए। पर हमारे यहां के लोग अब मौसमी भविष्यवाणी से निश्चिंत हो गए हैं। सुबह अखबार पढ़ा, भविष्यवाणी पढ़ी और एक स्मित हास स्वतः चेहरे पर खिल जाता है। तय मानिए, भारी बारिश की भविष्यवाणी है, तो आराम से निकलिए, बारिश नहीं होगी। खिली धूप और नमी आपका दिनभर बदन सहलाएगी। सुबह लोग ऊंकड़ू बैठे समाचार पढ़ते हैं बारिश की और अचानक खिली धूप उनका मुंह चिढ़ाने लगती है। इस विभाग का अरबों का बजट है, पर हमारे यहां के धरा-गगन सिद्धांत के प्रणेता डा एके झा कहते हैं- कैसे-कैसे बुद्धू बिठा दिए गए हैं। अरबों का खर्च और मुंह चिढ़ाती मौसमी भविष्यवाणियां। बताते चलें कि डा झा एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जो धरा-गगन सिद्धांत के प्रणेता हैं और झारखंड में कम से कम उनकी भविष्यवाणियां ९५ फीसदी खरी उतर चुकी हैं। उनकी भविष्यवाणियां आजमाई हुई हैं। वह मौसम विभाग की हर भविष्यवाणी पर चुटकी लेते हैं और उलटी स्थिति प्रस्तुत होने पर मुस्कुराते हुए अखबारी दफ्तर में प्रवेश करते हैं। क्यों भई- मौसम विभाग की भविष्यवाणी तो फेल हो गई। वह सही ही कह रहे होते हैं। फिर उनकी मौसमी भविष्यवाणी प्रकाशित होती है। १५ दिन बाद झमाझम बारिश होगी। अखबार में डरते-डरते खबर छपती है। १५ दिन बीतते हैं। घटाओं का नामोनिशान नहीं होता, पर अचानक जाने कहां से बादल घुमड़ने लगते हैं। मूसलाधार बारिश होने लगती है। लगता है- इस व्यक्ति को मौसम विभाग का प्रमुख होना चाहिए। यह यहां क्या कर रहा है। पर रांची में एचइसी के रिटायर्ड अभियंता डा एके झा का धरा-गगन सिद्धांत दिल्ली के मौसम विभाग की भविष्यवाणी से ज्यादा अहमियत रखता है। दुख सिर्फ इस बात का है कि डा झा के बाद उनकी यह विद्या लुप्त हो जाएगी। उनका कोई शागिर्द नहीं है। उनका यह अनोखा गुण उनके साथ ही चला जाएगा। झोला और कागज पत्तर लगातार ढोनेवाला यह आदमी एक थाती है, पर वह खुद में इतना सिमटा हुआ और व्यवस्था से विरत हैं कि अपने इस गुण का विस्तार भी कभी करने की नहीं सोची। वह मौसम से बातें करते हैं, मौसम उनकी बात मानता है। मौसम और उनके बीच का संबंध अद्भुत है।

Sunday, September 6, 2009

उत्साह मार दिया बरसात ने

झारखंड में झूम कर बरसात हो रही है। चक्रवात के डीप डिप्रेशन के कारण गली-कूचों में समंदर सा सैलाब उमड़ रहा है। मुख्य सड़क की कई दुकानें बंद हैं। दुकानदार यह सोचकर नहीं आए कि क्या फायदा। जब ग्राहक ही नहीं होंगे, तो तरद्दुद किस बात की। इस बरसात से सबको चिढ़ इसलिए हो गई है, क्योंकि एक तो यह सावन-भादो बीतने के बाद आई है। रही-सही कसर पूरी करने। भादो की बरसात में जिन किसानों ने थोड़े बिचड़े लगाए थे, उनकी फसल अब झूमने लगी थी। इस पानी ने इतना मौका भी न दिया कि खेतों की मेड़ संवार लें। जिनके खेतों में मकई लगी थी, वह फसल जमीन की तरावट से धरती पर लोटने लगी है। फसल तो गई। किसान हैरान-परेशान है। उपज का भरोसा नहीं रहा। दुर्गा पूजा नजदीक है। शहर में पंडाल बनने लगे थे। लाइटिंग के लिए खंभे खड़े किए जा चुके थे। सारा काम रुका पड़ा है। जो कलाकार मूर्तियां बना रहे हैं, उसपर फैली नमी उन्हें परेशान कर रही है। रंगों का संयोजन नहीं हो पा रहा। मां का शृंगार बरसात की विभीषिका थमने के इंतजार में है। बच्चे निराश हैं। सड़कों पर चहलपहल नहीं है। पीड़ाएं तो कई हैं, पर आस पर निराशा का हावी होना सचमुच दुखद है। छोटी जगहों पर मनोरंजन के बहुत इंतजामात नहीं होते। खुशियों के पल चुराने होते हैं। उसपर भी ग्रहण लगा हुआ है। दुर्गा पूजा के एक पखवारा पहले से वातावरण में उल्लास घुलने लगता है। मौसम सही होता तो आश्विन की मीठी धूप में पूरे परिवार के साथ लोग देर रात तक पूजा की तैयारियों में व्यस्त रहते हैं। सबकुछ रुका पड़ा है। यह बरसात पूजा के उत्साह को मार कर जाएगी। छोटे कस्बे फिर से निराशा के भंवर में हैं। जाने कब उनके चेहरों पर खिलेगी मुस्कान।

Saturday, September 5, 2009

सन्नाटा तोड़ने की जिद

देखिए ना, यों ही छह महीने बीत गए। करीब डेढ़ साल पहले ब्लागिंग की दुनिया ऐसे खींच ले गई थी कि रात-दिन ब्लाग के बारे में ही ख्यालात आते थे। कितना मजा आता था। ले आउट बनाने से लेकर डैशबोर्ड पर नई डिजाइन बनाना कितना रोमांचित करता था। इस बीच छह महीने में जाने कैसे ब्लागिंग की सुध ही ना रही। अब पता चला कि ब्लागर भाइयों को कितनी जहमत उठानी पड़ती है। यह काम बहुत कठिन है। मन की एकाग्रता की जरूरत होती है। विषय खंगालने होते हैं। मैं कभी मन की भड़ास निकालने की खातिर ब्लागिंग नहीं कर पाया। एकबारगी मन को कचोटते मुद्दों ने दस्तक दी और स्वतः ऊंगलियां की बोर्ड पर दौड़ने लगीं। कभी मौसम ने शब्द दिए, तो कभी तात्कालिक परिस्थितियों ने। ब्रजेश, अनुराग, अरुण आदित्य- हम सबने लगभग एक समय ही अपना-अपना ब्लाग बनाया था। उन सभी के ब्लाग देखता हूं, तो उनपर भी सन्नाटा मिलता है। काफी दिनों में कोई पोस्ट चिपकी मिलती है। इससे मुझे सुकून मिलता है। लगता है-सिर्फ मैं ही नहीं हूं अकेला, जो ब्लाग बनाकर कन्टीन्यू नहीं कर पा रहा। पर हमेशा यह लगता रहा कि आज एक पोस्ट होनी चाहिए। मुद्दे भी आकर बारहा खिड़की खड़काते हैं। पर वक्त की कमी से पोस्ट नहीं डल पाती। अब फिर से उत्साह ने जोर मारा है। ब्लाग की दुनिया को जैसी रवानी कम से कम हम मीडियावालों के लिए भड़ास ४ मीडिया ने दी है, उससे ब्लागिंग के प्रति अनुराग फिर उमड़ आया है। आप सब की दुआ रही, तो आनेवाले दिनों में कुछ नए एपीसोड फिर शुरू करूंगा।

Friday, April 17, 2009

वरुण बहक गये, वर्ना हीरो तो हैं ही

भाजपा के पीलीभीत से उम्मीदवार, इमरजेंसी में चर्चित संजय गांधी और प्रख्यात पर्यावरणविद मेनका गांधी के बेटे और देश की लौह महिला पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पोते वरुण गांधी अपने कथित जहरीले भाषण के लिए पूरे देश में आलोचना का पात्र बने हुए हैं। परोल पर छूटे वरुण, तो कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की तत्काल टिप्पणी आयी- वरुण की हवा निकल गयी। वरुण का मामला अदालत में है। वरुण दोषी हैं या निर्दोष यह फैसला अदालत करेगी। उसका फैसला सिर-आंखों पर।
पर वरुण को लेकर जिस किस्म की राजनीति हुई है, उससे एक अलग तरीके का जहर बहुसंख्यकों के मन में घुल रहा है। वरुण ने जो कहा, उसमें अगर सचमुच किसी कौम विशेष को लेकर जहरीली टिप्पणी है, तो वरुण ने वाकई गलत किया। वह अभी बच्चे हैं। उनकी उम्र अभी कम है। वह राजनीति के पेंच कम समझते हैं। वह उन लोगों जितने परिपक्व और कुशल संगठनकर्ता नहीं हैं, जिन्होंने देश के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अपने निजी कानून का हवाला देकर बदलवा लिया था। वरुण बाल ठाकरे की तरह पालिश्ड भी नहीं हैं, क्योंकि ठाकरे कहते हमेशा अपने मन की हैं, पर लेखन की स्वतंत्रता की आड़ में। ठाकरे का होल्ड है, वह मराठियों के भाग्य विधाता बनने की योग्यता पा चुके हैं।
वरुण के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उन्हें देश को चोट पहुंचानेवाली राजनीति सहन नहीं होती। यह उन्हें कांग्रेस से सीखना चाहिए, जो आजादी के बाद अधिकांश समय तक सत्ता में बने रहते कश्मीर का सारा खेल बिगाड़ कर रख दिया, वह भी सलीके से। कश्मीर में आज स्थिति यह है कि भारत के लिए हो रहे आम चुनाव में दम भर पाकिस्तान की वकालत करनेवाला अलगाववादी सज्जाद लोन चुनाव में खड़ा है। संभव है वह जीत भी जाये और संसद में अलग कश्मीर की मांग बुलंद करे। वरुण को वामपंथियों से भी सीख लेनी चाहिए कि किस तरह दो दशक तक बंगाल में राज करते हुए उन्होंने बांग्लादेशियों को पश्चिम बंगाल में रहने, जीने-खाने और वोट देने का अधिकार सुनिश्चित किया। आज पूरे बंगाल में यही बांग्लादेशी प्रत्याशियों की किस्मत तय करते हैं। आतंकवादियों को अपने घर में पनाह देते हैं। देश की सुरक्षा में छेद करते हैं। जासूसों को देश के खिलाफ काम करने का मौका मुहैया कराते हैं।
वरुण को शायद नहीं पता कि इस देश में बहुसंख्यक हिंदुओं की आस्था, मानबिंदुओं, संस्कृति और परंपरा की बात करना पाप है। ऐसा कहनेवाला सांप्रदायिक है। वह भावावेश में बोल तो गये, पर बेचारी मेनका का दिन का चैन, रात की नींद हराम कर दी। वरुण को कुछ बोलना है, कुछ करना है हिंदुओं के लिए, तो इसकी टैक्टिक्स उन्हें अभी और सीखनी होगी। हिंदुओं को गाली देने, उनकी परंपरा की खिल्ली उड़ाने और सभ्यता के नाम पर ढेरों पंथ की जी-हुजूरी में लगे यहां के समाज में वरुण को वह चालाकी सीखनी ही होगी, जिसके बूते इस देश को कौम के नाम पर प्रयोगशाला बना दिया गया है। वरुण की विचारधारा उन्हें सचमुच हीरो के काबिल बनाती है, पर उनके एक्ट करने का तरीका गलत है। उम्मीद है, उम्र बढ़ने के साथ वह इसे सीख जायेंगे।

Thursday, April 16, 2009

इस लोकतंत्र का क्या मतलब है

देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले चरण के चुनाव में व्यापक हिंसा से स्वाभाविक रूप से चिंता उभरती है। झारखंड में तो चुनाव के एक दिन पहले से हमले शुरू हो गये थे। यहां कुल मिलाकर दो दिनों में १५ लोग नक्सली हिंसा में मारे जा चुके हैं। चुनाव के एक दिन पहले मतदानकर्मी मतदान की सामग्री लेकर जब उग्रवाद प्रभावित इलाकों में जा रहे थे, तो उनके रिश्तेदार उनसे ऐसे मिल रहे थे, मानो फिर मिलना हो पायेगा या नहीं। बड़ा हृदयविदारक दृश्य था। एक मां का जवान बेटा बैंक में पीओ था। उसे उग्रवाद प्रभावित चतरा में चुनाव ड्यूटी पर जाना था। वह बार-बार अपने हाथ कुलदेवता के आगे जोड़ रही थी और बुदबुदा रही थी- हे छठी मैया, बेटा लौटकर सकुशल आयेगा, तो चैती छठ भूखेंगे। घर में पूजा करायेंगे। यहां २२ में से १८ जिले उग्रवाद प्रभावित हैं और इन जिलों में जानेवाले मतदानकर्मियों के परिजनों का भी यही हाल था। यह है वास्तविक स्थिति। १६ मई को मतदान का आधा समय गुजर जाने के बावजूद अधिकतम २० फीसदी वोटिंग हो पायी थी। सिमडेगा में पदस्थापित एक पौल आब्जर्वर को किसी ने कहा- उधर मत जाइए, नक्सली हमला हो सकता है, तो उसे हार्ट अटैक हो गया। उसे अपोलो में भर्ती कराया गया है। नक्सलियों ने जहां चाहा, जैसे चाहा हिंसा फैलायी और तमाम सुरक्षा बंदोबस्त के बावजूद हिंसा हुई, लोग घर से निकलने में डरते रहे।
ऐसे हालात में इन चुनावों के क्या मायने हैं। जिस महापर्व में जनता जनार्दन की ही भागीदारी नहीं हो, जहां नक्सली बैखौफ जवानों और आमलोगों को उड़ा देते हों, चुनाव आयोग और पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहता हो, वहां लोकतंत्र मजाक ही बन जाता है। ऐसा ही मजाक झारखंड में हुआ। दरअसल नक्सलियों को पालने-पोसनेवाले, उनकी मदद से चुनावी समर जीतनेवाले नेता ही असली गुनहगार हैं। झारखंड के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र के अधिकांश नेताओं का नक्सलियों से गंठजोड़ है। वे नक्सलियों से अपने पक्ष में वोट डालने का जुगाड़ करते हैं, बदले में उन्हें मोटी रकम देते हैं। चुनाव के महीनों पहले से नेताओं के घरों में नक्सलियों के साथ उनकी मीटिंग होती है। क्या यह खुफिया एजेंसियों और पुलिस प्रशासन को पता नहीं है? सारी जानकारी होते हुए वे आंखें मूंदे रहते हैं। यह व्यवस्था सिर्फ जनता ही पलट सकती थी, अपने वोट से, जिसके लिए मीडिया समेत अन्य एजेंसियों और दलों ने व्यापक वोटर जागरूकता अभियान चलाया। पर सारा अभियान फेल हो गया। नक्सलियों ने अपनी मनमानी कर ही ली। ऐसे में लोकतंत्र की आस और मलिन ही हुई है। इस दारुण स्थिति से जितना जल्द निकला जाये, उतना ही अच्छा होगा, वर्ना लोकतंत्र ढहने से बचाना मुश्किल होगा।